
आब द्वीतीन हफ्त है गईं, होलिक त्यार लै न्है गो. होलिक पैलि बिजली दफ्तर वाल कूंणौंछि कि पैलि मार्च बटि दिन भर बिजुलि नी जालि. के लै नी बदल. यां हल्द्वाणि में इग्यार बजि बटि साव तीन जांले बिजुलि नी रैं. हल्द्वाणि ठुल जाग छु. पत्त नै नान-नान जागूं में गौंऊं में के है रौ न्हल!
सरकारौक के कूंछा महराज! इतुक ठुल टिहरी जस जाग पाणि में डुबै बेर एक डाम बणा कि यौ हमर पहाड़म कभैं लै लाइटैकि कमि नी होलि. हज्जारूं लोगूंक घर बार डुबौ, खेत डुबीं, देवि-देवताऊंक थान डुबीं. अब खूब बिजुलि बणाई जाणै बलि. अखबारम लेख रौछि कि एक अफसरल बता बिजुलीक कमीक कारण सार उत्तराखण्ड राज्य में रोज चार घन्ट बिजुलि काटि जालि. नान नान रोजगार करणी वाल सब लोग दिक है गईं किलै कि काम करणक टैम पै मसीन-हसीन साब्ब ठप्प रूनी. गर्मी दिन लै ऊण भैट गईं. पत्त नै के हौल.
तीन चार दिन पैलि सरकारल हल्द्वाणि नजीक जमराणि डाम बणूंण लिजी होय कै हालौ. एक डाम आई बणल, चार घन्ट बिजुलि आई काटी जाल. यौ छू सैबो, कै नाम कूंनी, ऊर्जा प्रदेश.
ठुल बुड़ि बाड़ि अजकाल जादे बातचीत नी करन. बस नई जमानक नानतिनौं कैं चाइयै रूंनी. स्कूल में पत्त नैं के करनी अजकालक नानतिन. स्कूल जांण है पैली और स्कूलल वापिस ऊणक बाद जब देखो ट्यूशनै-ट्य़ूशन. रिजल्ट चाओ तो ठन ठन गोपाल है रूं. न हिन्दी ऐं न इंग्लिस. कुमाऊंनी-गढ़वालि की तो पूछौ झन.
तीन चार दिन पैली फूल देई त्यार छी. हम जब नानतिन छी तो द्वार द्वार जै बे चार आन-आठ आन लिजी धाद लगूंछी: "फूल देई छम्मा देई, देणो द्वार भूर भकार, यो देई सै नमश्कार, पूजै द्वार". अब नानतिनांकैं सरम लै लागैं और चार-पांच में पड़णिं वाल नानतिन मोबाइल कान में लगाईयै रूनी और इज थैं बखत बखत मैगी हैगी मांगण रूंनी. पत्त न कै भल लागनी यौ कितौल जस मैगी-हैगी. खैर, जो लै बिचार तीन चार नानतिन फूल देई मणूण हुं ऊंनी, उनूंल चार-पांच साल बटि एक नई गीत बणै हालौ: "फूल देई छम्मा देई, जितना दो उतना सही".
गौं में रूंण वाल म्यर काकौक च्यल गणेश बेलि घर ऐ रौ छी. बतूंण लाग भैटौ कि हमर गौं में सराबलै यस हाहाकारी कर हालि कि ब्याल हुनै हुनै क्वे ले आदिम सिद्द न हिट सकन. सब आदिम - बुड़, ज्वान, लौंड-मौंड सब सराक खै बेर टोटिल हुई रैनी. मलि बाखई में रूनी वाल लीलुका अपुण द्वि च्यलूंक दगड़ि घरै में सराब खानीं और घरैकि सैणियूं कैं गालि हालनी. कभैं-कभैं चुट लै दिनी. एक म्हैण पैली द्वारहाटक एक गौं में एक आदिमल दारु खै बेर अपुण सांक्कै भैक गाव काट दे. एक दुसर गौं में एक आदिमल अपुणि सांक्कि बैणीक च्यल कैं इतु मारौ कि ऊ अस्पताल लिजाण लिजाणै मर गो.
ब्या-काज हो, नामकन्द हो, सराद हो - सराबक बिना क्वे चीज पूरि नी हैं. और अब तो लोगबागूंल अपुण और अपुण नानतिनाक के नाम कूंनी हैप्पी बड्डे मणूल लौ सुरू कर हालौ. पैली नानतिन और सैणी कच्चर बच्चर खानीं फिर जै ब्याल हुनै हुनै बोतलै बोतल. मारामार, चूटाचुट. सराब बन्द करूणक लिजी क्वे-क्वे जाग में कभैं कभैं सैणि लोग जलुस निकालनी. तीन चार दिन खूब हल्ल गुल्ल रूं. वीक बाद ठुल-नान अफसर ऐ बेर सब ठीक करै जानी - सराब पीणी वालूंकि फिर बहार ऐ जैं. सरकार कैं कि सब्बूं है जादै डबल सरकार कैं सराबक धन्द बटी मिलूं और नशाबन्दी करूणक मतलब विकास बन्द करूंण है जाल. तो खूब विकास है रौ आजकल. स्कूलूं में कतुकै मास्टर सराब पी बेर जानी. ट्रक मोटर चलूणी डरैवर लोग सराब पी बेर गाड़ि चलूंनी. स्कूलूं में नानतिनाक भविष्य खड्ड में जाणौ और जां तां रोडों में गाड़ि खड्ड में जाणईं. आदिम लोगूंक पैल चिन्ता ब्याल लिजी क्वाटरक जुगाड़ैकि हूण भैट गे. गौं में रूनी वाल सैणी पैलि लै घा-पाणीक चिन्ता में दिनमान भर काम करण में लागी रौंछी. आज लै उई हाल छू. बस पैली आदिम लोग मारण-पिटण कम करछी, अब ऊ लै खूब हूण भै गो.
जो लै हो उत्तराखण्ड के बणौ सराब पीण सबूंल सिखि है.
काम धाम, रोजगार सब्ब पट्ट छू. लौंड-मौंड के कर सकनी? तुमैं बताओ महराज!
देखो धैं, सौ साल पैलि कुमाऊंक भौतै ठुल कवि गौर्दा के कै गेईं:
लुटि पाटि सरवस करि हैलां हम गुलाम
सोचि लियौ हो भाइयो कब तुम आली फाम
फोड़ि कपालि हमारि करि खांछ धूम-धाम
मिलि मतो यसो करिया जसिकै रैजा यो थाम.
(नवभारत टाइम्स से साभार)

